संपूर्ण समर्पण (हिंदी आलेख)

News4u-फ़ीचर डेस्क- (हिंदी आलेख)  आये दिन नित नई स्टोरी की तलाश में मारा मारा फिरता एक जाने माने पत्र का रिपोर्टर मैं , हर कोशिश के बावजूद बॉस से कभी शाबाशी पाने का हक़दार न बन पाया था Iहर बार एक ही जुमला, “ अरे काम करते हो तो पूरे डेडिकेशन से करोI ये आधे अधूरे वाक्य, धुंधले कैरीकेचर, कहानी कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म कुछ पता नहींI ध्यान दो बाबा ध्यान दो काम पर, खाना, पीना, सोना, फॅमिली सब भूल कर कम्पलीट डेडीकेशन होगा तभी न टॉप स्टोरी बनेगी ? “

ये कम्पलीट डेडीकेशन, एक गाली बन गया था मेरे लिए जो बॉस जब चाहे मुझपर उछाल मारता था और मैं उसे अपने से चिपकाए गली मोहल्ले भटकता रहता था I एक दिन की बात, बहुत मायूस हो कर मैं एक मंदिर में जा घुसा I शायद इन देवता की मानता कुछ अधिक ही थी I दर्शन करने वालों की लम्बी कतार पूर्ण श्रध्दा से धीरे धीरे आगे की ओर सरक रही थी I जेब में हाथ डाला, एक सौ का नोट हाथ आया I घबरा कर उसे वापस ठूंसा, अभी स्कूटर में पेट्रोल डलवाना है I देखूं कुछ चेंज है कि नहीं I एक बार फिर जो जेब टटोली तो पांच का एक भारी सा सिक्का उँगलियों से आ टकराया I स्वस्ति की सांस ले कर कतार में जा मिला I

मेरे आगे एक मैली सी लुंगी और कमीज़ पहने जो व्यक्ति खड़ा था वह अपने रूपरंग से रिक्शावाला लग रहा था I कतार धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी I अब हम देव मूर्ति के ठीक सामने आ पहुंचे थे I मेरा पांच का सिक्का तैयार था, पर मेरे आगे वाला कुछ बेचैन दिखाई दे रहा था I उसने पहले मुडा सा दो का एक नोट निकाला फिर कुछ सोचता सा पांच का नोट जेब से बाहर खींचा I इस प्रक्रिया में दस के दो नोट भी बाहर आ रहे I अब उसके हाथ में उसकी पूरी पूँजी थी I

मैं बड़ी जिज्ञासा से उसे देख रहा था I तभी देखा कि न जाने क्या सोच कर उसने अपनी कुल जमा पूँजी देवता के सामने रख दी I हौले से सिर नवा कर ही वह झट से भीड़ में खो गया I चकित और सशंकित मन ले कर मैं बाहर आया I सोचा अपनी अब तक की कमाई देव की भेंट चढ़ा कर वह रिक्शा वाला किसी कोने में खड़ा पछता तो नहीं रहा I पर नहीं सामने सरक पर अपने खाली रिक्शे को एक एइ से लहरा कर खींचते हुए वह ऊंची आवाज़ में कोई भजन गा रहा था I उसके चेहरे पर एक अजीब सुख की छाया थी, संतोष का आनंद था I और मैं – आज मुझे सम्पूर्ण समर्पण का मतलब समझ में आ गया था i

अब बॉस को ये जुमला यानी कम्प्लीट डेडीकेशन बोलने का मौका नहीं दूंगा i मैंने मन ही मन प्रण ले डाला था I

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on — http://ipen-veera.blogspot.in/

मंदिर मैं भक्तों की कतार

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कश्मीरी अवाम के नाम एक अराजनैतिक पत्र

News4u-फ़ीचर डेस्क- एक तरफ़ जन्नत का नज़ारा देने वाली कश्मीर वादियां और दूसरी ओर कभी भी कहीं भी, आतंकियों का खूनी खेल। एक तरफ़ भोले भाले आमजन जो डल झील पर तैरती कश्तियों पर सवार सैलानियों को ख़ुशबूदार केसर और तरह तरह के आभूषण बेचते हैं और दूसरी तरफ़ आईएसआईएस का झंडा फहराते अलगाववादी I कश्मीर की तस्वीर के ये दो पहलू हैं जो बेहद दर्दनाक और अशांत करने वाले हैं I

आईएसआईएस या पाकिस्तान का झंडा ऊँचा करने वाले कश्मीरी क्या पड़ोसी पाकिस्तान और आईएसआईएस से त्रस्त दूसरे देशों के हालात से बेख़बर हैं ? क्या वे इस खूबसूरत प्रदेश को कसाइयों के हवाले करके चैन से रहने की उम्मीद कर सकते हैं?

कड़वा सच तो ये है कि कश्मीर पर मुसलमानों का कोई मौरूसी हक़ बनता नहीं I कभी इतिहास की तरफ देखें तो पता चले कि कश्मीर संस्कृत शब्द कस्मीरा से निकला है I कभी कश्यप नाम के ऋषि ने इसे बसाया था और उन्हीं के नाम से ये कहलाया, कश्मीर I

चलो इसे छोड़ भी दें तो ये स्थापित सत्य है कि मध्य युग में कश्मीर बौद्ध और हिन्दू धर्म का समन्वय केंद्र रहा I आगे जा कर मौर्यवंशी सम्राट अशोक ने कश्मीर की पुरानी राजधानी श्रृंगेरी की नीवं रखी जो आज श्रीनगर के बाहर खँडहर बना पड़ा है.

पहली शती के पूर्वार्ध तक पूर्व और मध्य एशिया से बौद्ध भिक्षु यहाँ आते रहे I चौथी शती के अंत में कई प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु यहाँ आये और बस गए I नवीं शती में यहाँ शैव मत का प्रचार हुआ I कहना ये है कि कश्मीर घाटी की नीवँ में बौद्ध और हिन्दू विचारधारा बह रही है, जो १३वीँ और १४वीं शती में,इसके इस्लामीकरण के बाद भी अंदर अंदर बहती रही I आज कश्मीरी सूफ़ी दर्शन में हम उसी का अक्स पाते हैं I

१३३९ में शाहमीर कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक बना I अगली पांच शतियों तक इस्लाम ने कश्मीर को अपनी जकड़ में रखा जिनमे मुग़ल भी शामिल थे और दुर्रानी भी I फिर १८४६ में अंग्रेजों और सिखों की लड़ाइयों के बाद कश्मीर सिखों के शासन में आ गया I पहली ब्रिटिश सिख लड़ाई के बाद जो संधि हुई उसके द्वारा कश्मीर सदा के लिए सिख राज्य का हिस्सा बन गया I गुलाबसिंह कश्मीर का नया राजा बना और जब देश विभाजन के बाद पाकी कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला किया तो तत्कालीन राजा हरीसिंह ने नि:शर्त भारत के साथ विलय का फैसला ले लिया I

इतिहास के ये पन्ने बताते है कि कश्मीर कभी भारतीय सभ्यता और संस्कृति से अलग नहीं रहा I इस्लाम अगर यहाँ समृद्ध हुआ तो हिन्दू धर्म भी कम नहीं रहा I सच तो ये है कि कश्मीर के बाशिंदे कश्मीरी पंडित आज दर दर की ठोकरें खा रहे हैं, जब कि अपने को कश्मीर का ठेकेदार बताने वाले हर दिन कभी पाकिस्तान तो कभी आईएसआईएस का झंडा फहरा कर इस देश से अलग होने का एलान करते रहते हैं I

जब कश्मीर किसी प्राकृतिक आपदा से त्रस्त होता है तो वही लोग मौत से लड़कर इन लोगों को बचाते हैं जो उनपर मौका मिलते ही पत्थर बरसाने से नहीं चूकते I हमें मालूम है कि एक आम कश्मीरी शांति और अमन चाहता है, बीजेपी को जिता कर अधिकाँश ने अपना मत बता दिया है , पर बाक़ी सब चुप क्यों हैं?

कश्मीरियों की यह चुप्पी अलगाववादियों की हिम्मत बढ़ाती जाती है I सवाल है कि क्या कश्मीर पाकिस्तान जैसे देश में मिलना चाहता है , जहाँ कि अवाम ख़ुद आतंकियों से परेशान है ? या वह सोचता है कि वह एक स्वतंत्र राज्य के रूप में कभी भी ज़िंदा रह सकेगा I पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के होते क्या कभी ऐसा हो पायेगा ? तिब्बत का हाल क्या उन्हें दिखाई नहीं देता I पाक अधिकृत कश्मीर की बदहाली से क्या कश्मीरी अनजान हैं? अगर ये समझ में आ जाता तो अलगाववादियों  को  अलग थलग करके चैन से बैठते कश्मीरी I देखा जाए तो मुसलमानों का हक़ न पाकिस्तान पर है न ही कश्मीर पर I ये तो भारतीय सभ्यता है जो विदेशियों को भी अपनी धरती पर बसने का हक़ दे देती है, वर्ना क्या फ़लस्तीनियों जैसी मिसालें सामने नहीं हैं I रही भारतीय सेनाओं की ज्यादतियों की बात तो अनाज के साथ घुन पिसता ही है I अगर आप सबने आरम्भ से ही अलगाववादी आतंकियों को अपने घरों में पनाह न दी होती तो कई बेगुनाह बच्चे संदेह का शिकार हो कर जान गवाने से बच जाते.

जो भी हो अब भी समझ जाएँ - पहली बात ये कि इस धरती पर आप का मौरूसी हक़ नहीं , दूसरी ये कि, न आईएसआईएस, न पाक के झंडे आपको एक अमन की ज़िंदगी दिला सकते हैं I बुध्द की इस धरती पर शांति से रहने के लिए आपको इतिहास के साथ साथ भारतीयोँ की सहृदयता का भी सम्मान करना होगा I भारत विरोधी ताक़तों का साथ देना छोड़ दें तभी ये जन्नत सुरक्षित रह पायेगी I जन्नत की हिफाज़त शैतान नहीं किया करते I वो सिर्फ विनाश और बरबादी ही कर सकते है I यह याद रखना ज़रूरी है I


By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on — http://ipen-veera.blogspot.in/

कश्मीर

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Commercialising Surrogacy

News4u- Feature Desk- By Veera Chaturvedi-The government has at last woken up to the fast growing cases of surrogacy in India. After banning commercial surrogacy, they are finalising a legislation to allow surrogacy only to childless Indian couples. After that the court would ponder over other issues relating to surrogacy, like the parental right over the surrogate child.

All over the world the Royal moms, refrained from feeding their babies for fear of losing their body curves. In such cases some lady ,mostly of the serving class, was engaged to feed the baby while her own child subsisted on cow’s milk. The poor woman accepted the work for it meant good money as well as respect in the Royal family.She was called Dhai Ma. We have the enthralling tale of Panna Dhai who sacrifised her own son to save the prince she had been feeding since birth. The point to be noted is that these Dhai mas were emotionally attached to the children they mothered.This love was accepted by the society.
However, the present generation has gone a step further,world over. Its not always the curse of being unable to bear a child but the unwillingness to go through the travails of child birth and losing one’s figure that has escalated the number of couples opting for a surrogate mother to bear a child for them.

Moreover with most of the women working in offices and outside their homes, this trend took up speed. Foreigners found an easy womb to fulfill their wishes with pockets jingling with money. Money became the important force to lure poor women of India to offer themselves as ‘Kiraye ki kokh’. Even actors like Aamir Khan and Shahrukh Khan added children to their family without their delicate wives going through the pangs of childbirth. In other words it has become a fashion to add children to one’s family by hiring a womb. It is just like buying a beautiful artifact to add to the home decor.

People argue that this has given many poor families a chance to earn a substantial amount of money and change their fortunes. Still human mind is not a machine and a woman’s womb cannot be treated like a nursery where seeds are planted to grow up in plants and sold to the needy. Sometime some where the mother’s mind is bound to feel a bonding with the infant she had borne for full nine months. Its not aginst human nature. In the ourse of time such a child could also like to know who had given birth to him and fed with her own blood.

The government has taken a good decision to ban commercialisation of surrogacy. The rich nations have always taken advantage of our poverty. After the flesh trade, surrogacy is going the same way with middlemen appearing here and there. Lets stop this insensitive use of women. However for a childless couple, with no other options, the laws can be relaxed.

Commercialising Surrogacy

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Sanjay Leela Bhansali is no K. Asif…..

News4u-Features Desk- Mughale-aazam is a milestone in film making as far as the treatment of story, characterisation and the historical background is concerned. Jodha Akbar was also restrained and impressive. Its true that in both the above films, the film maker took liberty with history, still the main characters were handled skillfully never crossing the lines of decency and royal upbringing.

Bhansali has also tried his hand at history, glamour and glitz in Baajirao Mastaani. However he has fallen prey to the popular demands of song and dance even when the character in question is a warrior like Baajirao. Ranveer Singh is a good actor. He does portray a warrior king very ably. However when he is asked to dance and sing in his royal attire, he irritates the viewer no end. So does Deepika when she suddenly appears in Priyanka’s room and starts dancing with her. A Maratha queen dancing with a captive is stretching imagination too far. One thing which is deeply missed in the Baajirao Mastaani relationship, is the passion, the intesity of love which Dilip Kumar and Madhubala could bring across without uttering a single dialogue. There is a scene in Baajirao Mastaani like the most memorable and romantic scene of Mughle-aazam, where the lovers lost in themselves are surprised by a visit from the King Akbar. Here the impact of this scene is almost nothing compared to one in Mughle-aazam, though the situation is almost similar.

Bhansali had previously also meddled with the Sharat Chandra’s famous novel Devdas, turning the characters into almost unrecognisable ones. In Baajirao Mastaani at least the glamour and glitz with the superb cinematography, impress the viewers. Some of the scenes stay with you for ever. The battle scenes are very well picturised. Yet the end result is not what should have been with such a lot of hard work and money spent on the film. The viewers would remeber the film for the three characters portrayed superbly by Priyanka, Ranveer and Deepika and not for the romantic love story of Baajirao Mastaani, which failed to convey the intensity of their relationship.

Its not easy to become a K. Asif even if the camera and finances are with you and the actors brilliant.

BY- Veera Chaturvedi

BAJIRAO MASTANI

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ख़ामोश है दरवाज़ा ( A Memoir - in Hindi )

News4u-Features Desk- गुलाबी शहर जयपुर की जानी मानी मिर्ज़ा इस्माइल रोड पर पांच बत्ती से आगे स्टेशन की ओर जाती सड़क पर कुछ दायें सड़क एक रास्ता सा बना देती है भीतर की तरफ़ । वहीँ खड़ा है एक लम्बा चौड़ा दरवाज़ा जो अपनी ख़ामोशी कभी नहीं तोड़ता । उसमे एक छोटी सी खिड़की भी है पर वह भी चुप-चाप आने जाने वालों को देखती भर रहती है ।

साल में न जाने कितनी आँखें सिर्फ इस दरवाज़े को देखने के लिए ही इधर का रुख करती हैं, लेकिन कोई दस्तक नहीं देता । अंदर का सच सबके भीतर मेहफ़ूज़ है , उसे छेड़े क्यों?

मैं आज उसी दरवाज़े के बहर खड़ी हूँ । न खुले दरवाज़ा , मैं तो सब कुछ आर-पार देख पा रही हूँ। ऊंचा पूरा गुलतुर्रा लाल फूलों से लदा है, बेचारा अमरूद उसकी छाओं में पनप नहीं पाता पर फल बराबर देता है । ये और बात है कि ये फल कभी पक नहीं पाते । शैतान बच्चों की पूरी जमात उनपर निगाह लगाये रहती है ।
गुलतुरे की छाया में आराम से सोया हरे कालीन सा लॉन और उसके किनारे किनारे लगे फूलों के पौधे और उधर अशोक का ऊंचा दरख़्त साथ में दो बहनो सी बतयाती मौलश्री , अपनी जगह वहीँ हैं । दरवाज़े के पास अंदर सभी कमरों पर चिक पड़ी है । भाई लोग पढ़ें या क्रिकेट की चर्चा करें किसी को पता नहीं चलता । हाँ, जब वे बाहर आकर क्रिकेट खेलते या पतंग उड़ाने छत पर जाते तो एक शोर से सारा घर जाग उठता ।

बोगनविलिया और पीले फूलों वाले कनेर के साथ ही हम सब बड़े हुए। एक ओर फूलों से भरा आँचल बिछाये बैठी बेला की लतर रात भर महकती , सुबह सवेरे लुट जाती । सुबह शाम चिकों के पीछे कमरों से घंटी बजने और दबे दबे सुर में आरती का स्वर उभरता और शाम रात में ढल जाती ।

गर्मी में आँगन में बिछी ढेरों चारपाइयां और उनपर लेटी चाचियाँ, ताइयां , भाभियाँ , बहने और बच्चे - कहीं लोरिया , कहीं कहानियां तो कहीं आंसू और शिकायतें । सब हवा में आज तक घुली मिली हैं ।

पढाई वाले कमरे में लड़कियों की खुस-फुस , उनकी हसीं एक अनुशासन पसंद आवाज़ के डर से कहीं दुबक जाती । क्रिकेट कमेंटरी सुनने की चाहत लिए कान या बिनाका गीत माला के प्रेमी भी इसी आवाज़ से सहम बत्ती बंद कर कोने में छिप जाते ।

ताउजी की आवाज़ पर पर्दा करने वाली भाभियाँ , चाचाओं और भाइयों की आवाज़ पर काम के लिए दौड़ पड़ने वाली लड़कियां , लम्बी चौड़ी रसोई में चूल्हे के सामने पसीने में नहाईं भाभियाँ और चाचियाँ , उन सब की चूड़ियों की खनक , आपस की चुहलबाज़ियाँ इस दरवाज़े के पीछे आज तक गूंजती हैं ।

“बस आगई !” का शोर सुबह से कई बार घर मैं गूंजता । लाल रिबन के फूल बनाये छोटी छोटी लडकियां , हरे लाल स्कर्ट में कुछ बड़ी और फिर सलवार कमीज में सजी कुछ और बड़ी लड़कियों के लिए बसें बार बार सड़क पर रूकती , दरवाज़ा देखता रहता ।

लम्बी चौड़ी छत से लटकती रंग बिरंगी साड़ियों की कतार , धुप खाते अचार , बड़ियां और आलू पापड़ के आस पास टहलती लड़कियां , इतनी बातें उनकी कि खत्म ही ना हों कभी । और फिर इसी छत पर बारात का स्वागत भोज , दूसरी छत पर से गालियां गाती घर की महिलाएं और कान लगाकर मज़ा लेते बाराती और घराती । सिल्क के कुर्तों में सजे घर के सभी मर्द बारात की ख़ातिर में माहिर होते ।

कहते हैं आवाज़ें कभी मरती नहीं , हवाओं में सुरक्षित रहती हैं । मेरे आँगन में हर बरस गर्मी में लम्बें चौड़े आँगन में सजे मंडप से गूंजती मुरादाबाद वाले पंडित के मंत्रोच्चार कानों में अभी भी उत्तर आतें हैं ।

हाँ दरवाज़े के पीछे और भी बहुत कुछ है । एक नौकर जो नौकर कम , चौकीदार ज़्यादा है । एक बड़ा सा कमरा जिसे साहब का कमरा कहते थे और जो वाकई कुछ राजसी सा लगता था । इसके अलावा मेरी माँ की दमें से भारी साँसे , बड़ चाची के हाथ का मुसलसल हिलता पंखा , दादी का मंद स्वर में गीता पाठ और बड़े हंडे की चाय , जिसके बिना ज़िन्दगी बदमज़ा होजाती ।

दरवाज़ा खामोश है पर मैं उसमें बोलती आवाज़ों को सुन सकती हूँ जब चाहूँ तभी ।

वीरा चतुर्वेदी

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on http://ipen-veera.blogspot.in/


ख़ामोश है दरवाज़ा

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Aamir, your fans are hurt.

News4u- Features Desk-I feel whatever could be said against or in favour of Aamir Khan, the actor, has been said and written. The voices whether against or for him have gone back to their daily chores.

The Facebook is waiting for another controversy to arise so that a debate could be started without coming to an end. The sum of it all is that the whole nation cares for Aamir, is concerned with what is on his mind and whether the person Aamir is different from the one they have liked and loved for so many years.

Aamir should be happy that the nation is as much worried or disturbed when he or his wife thinks of abondoing the country, as they are at the rising price of Arhar ki Daal and Onion. In fact people are not so much angry at his statement about increasing intolerance but at his wfie’s thought of moving out of the country.

For the logical mind, Aamir’s claim that the country is getting more and more intolerant every day, has weight. Not only communal feelings are being stoked by the self styled followers of Hinduism, the young generation is also indulging in mindless killing and road rage every other day. Yet, this is more or less the scene worldwide. We agree with Aamir on this issue. What could not be digested by his fans was his wife’s suggestion of moving out to another country. Even if she said it in some weak moment, was it necessary to declare it to the whole world.

This enraged and grieved your fans more than any thing else. They love you Aamir, remember that!!

By- Veera Chaturvedi

Aamir

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Waiting for a clarion call

News4u-Features Desk- For the first time recently writers of all genres are in the news. The TV channels, who thrived on the stories of Asaram & Radhey Ma are now discussing unabated the right and wrong of returning the awards to the government or the Academy related to them. The air is thick with ideas. The internet is agog with excitement. All the user of the FB have for the present turned their focus on the writers of this country.

The debate is on with the life going on as usual. No fundamentalist has yet put down his weapon, wielded to wound the opponent at the slightest hint of provocation. The leaders of neither community show a change of heart because Vajpayeeji or Munnawar Ranaji have returned their awards.

The truth is that not a shingle has moved on this earth in response to supreme sacrifice of these literatuers. Revolutions do not come about in this way. Lets look at the history of French Revolution or nearer, our fight for freedom. In France there is a long list of writers, poets, philosophers and journalists who raised their voice to rouse the common people against the dictatorial regime apart from Rousseau, the torch bearer, included poets like Andre Cheniel who was guillotined for writing rebellious poems. Anaohrsis Cloots, went the same way for expressing his ideas against the tyrannical king of France. Gandhiji, Ganesh Shankar Vidyarthi, Tilak and many more used News papers to spread thier ideas amongst the common man. These people gave away thier lives so that their fellow beings could live in a better world. Not even the fear of prison or guillotine could deter them. In France the revolution shook the very foundation of the French Royalty.

However instead of writing and speaking to people about the evils of casteism, communalism and goodaism, our writers are sitting pretty in their homes after surrendering the medals and awards which have long outlived their value for them. ( Some atleast returned the prize money, but others never thought about it).

There was Balkrishna Sharma Naveen, who once wrote -
“Kavi kuch aisee tan sunao, jisse uthal puthal mach jaye”. Where are those writers & poets who could arouse the people to change the system. There is no sane voice guiding the people, thatswhy, an Aqlakh is killed for no reason and the Maharashtra government comes to a stand still.

If we want to change this depressive scenerio, the saner voices should come out loud & clear with or without awards in their possessions.

By- Veera Chaturvedi

Revoltution

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Sick mentality

News4u-Features Desk- Man has always been adventurous. Crossing oceans, scaling high mountains and stretching out to touch the sky. There was curiosity underlying all these activities and a desire to get some thrill in life.

We have come a long way from being the ever moving tribal, running around for shelter and food. Its now a civilized world. Heaps of books have chronicled our culture and heritage. Its a polished society we live in. However the desire for thrill and suspense never left human mind. The lust for excitement could be controlled neither by pure knowledge nor rules of the society. It surfaces at the slightest pretext. The media also follows the same trail. To quote a recent example, we lost a great man, the ex-president Abdul Kalaam, coincidently a dreadful terrorist long awaiting judgement of his trial was hanged on the same day. Now most of the newspapers had the top story, shouting forth the terrorist’s hanging. Kalaam’s funeral unfortunately took a back seat.

Today nobody is talking about the long awaited Land Aquisition Bill, instead there is talk of the number of husbands Indrani Mukerji had and how many kids she bore to each of them. In the meantime the army caught one more terrorist but it did not catch eye balls. Nothing new there, we felt, while Indrani’s case is like a thriller.

What appals one is that some children even tampered with rail tracks just because they wanted to watch a train falling. The consequences did not matter. These children were neither ignorant nor insane. The growing incidents of rape by teenagers, murder at the slightest provocation, looting and kidnapping are all done because they provide them with thrill and excitement.

No Phantom, Spiderman, Batman, no story of real life war heroes can provide the thrill these young minds are looking for. Before things go out of hand, the thinkers and doers at the helm of our society should think of a solution to this problem. This hunger for mis-directed excitement should be contained before we go back to the caves thirsty for each other’s blood.

By Veera Chaturvedi

Sick mentality

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An ANGRY NATION AND THE INDEPENDENCE DAY

News4u-Features Desk- It was the mid- night of 14th August 1947 when this nation awoke to a new dawn, the dawn of freedom from centuries old British slavery,

We had fought a long and arduous battle against a cunning and brutish enemy. We managed to win in the end because there were leaders, genuine leaders who led us across the difficult terrain frought with blood and gore, to our destination.

Today the scene has changed drastically. There are a number of political parties, yet in the name of leadership there is only chaos. There is a crowd of loud-mouthed, self projecting, ignorant bullies who jeer at each other, pass unsavoury comments and keep the democratic process on hold. These hooligans, pretending to be our representative in the two houses, do their utmost to waste the common man’s hard earned money. These selfish creatures, this egoistical mob has reduced the janta to mute spectators while they enact their jugglery to disrupt every thing worth while. They forget that this show of dis-unity sends wrong signals to the terrorists surrounding our country.

Democracy is mocked at in the din of meaningless slogans and dishonourable behaviour of these so called leaders.

The manner in which public money is being wasted and no work done, the only way we can celebrate the Independence Day this time is to somehow shame all these parties in front of the whole nation. Let us plug our ears against all the rhetoric the PM is ready to pour forth in them. Let us only shout out slogans to shame all the members and leaders of different political parties. Let the nation speak out what it feels if betrayed by the leaders whom they voted to power.

Let us banish these treacherous leaders giving rise to anarchy. Let these slogans rant the air- down with enemies of the nation, down with twitters and rowdies who shame the country with their antics.

Let us atleast try to do some thing. Lets put a mirror before this errant crowd. You never know what might work.

By- Veera Chaturvedi

India

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YAKUB MEMON AND AFTER…

News4u-Features Desk- Yakub Memon is dead, yet the debate goes on and on as to whether legal options to secure his rights as a death-row prisoner were protected or not. There are arguments galore trying to prove that Memon did not get his due from Indian Judiciary.

The common man does not understand the complicated points raised by the defence lawyer and the custodians of Human Rights. The simple equation is that if Memon is proved to be directly connected with the Bombay Serial Blasts, he should be punished without delay. If Memon had
a right to life, what about those lives he unhesitatingly extinguished in a most cruel manner. If he had a right to live, what about those whose lives were cut off in the middle of the journey?

What kind of law is this which feeds and pampers a Kasab for years forgetting about those innocents who were mowed down by him for no guilt of theirs. We guard him and treat him like a dear guest while there is no dearth of eye witnesses against the henious crime. In the same way even after Memon was found guilty in the Bombay blast case, we gave him, ample time to prove his innocence.

The political philosophers, the so called scholars and activists do not seem to care about the feelings of those whose whole families were wiped out in one go and the killer still alive before their eyes, begging for mercy.

In such cases, delays turn into injustice and people feel betrayed. What is needed is a quick decision, a clear judgement and no right to mercy for the barbarian. Rather he should be punished in such a way that the onlookers think twice before indulging in such barborous acts.

By :- Veera Chaturvedi

Yakub Menon

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