संपूर्ण समर्पण (हिंदी आलेख)

News4u-फ़ीचर डेस्क- (हिंदी आलेख)  आये दिन नित नई स्टोरी की तलाश में मारा मारा फिरता एक जाने माने पत्र का रिपोर्टर मैं , हर कोशिश के बावजूद बॉस से कभी शाबाशी पाने का हक़दार न बन पाया था Iहर बार एक ही जुमला, “ अरे काम करते हो तो पूरे डेडिकेशन से करोI ये आधे अधूरे वाक्य, धुंधले कैरीकेचर, कहानी कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म कुछ पता नहींI ध्यान दो बाबा ध्यान दो काम पर, खाना, पीना, सोना, फॅमिली सब भूल कर कम्पलीट डेडीकेशन होगा तभी न टॉप स्टोरी बनेगी ? “

ये कम्पलीट डेडीकेशन, एक गाली बन गया था मेरे लिए जो बॉस जब चाहे मुझपर उछाल मारता था और मैं उसे अपने से चिपकाए गली मोहल्ले भटकता रहता था I एक दिन की बात, बहुत मायूस हो कर मैं एक मंदिर में जा घुसा I शायद इन देवता की मानता कुछ अधिक ही थी I दर्शन करने वालों की लम्बी कतार पूर्ण श्रध्दा से धीरे धीरे आगे की ओर सरक रही थी I जेब में हाथ डाला, एक सौ का नोट हाथ आया I घबरा कर उसे वापस ठूंसा, अभी स्कूटर में पेट्रोल डलवाना है I देखूं कुछ चेंज है कि नहीं I एक बार फिर जो जेब टटोली तो पांच का एक भारी सा सिक्का उँगलियों से आ टकराया I स्वस्ति की सांस ले कर कतार में जा मिला I

मेरे आगे एक मैली सी लुंगी और कमीज़ पहने जो व्यक्ति खड़ा था वह अपने रूपरंग से रिक्शावाला लग रहा था I कतार धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी I अब हम देव मूर्ति के ठीक सामने आ पहुंचे थे I मेरा पांच का सिक्का तैयार था, पर मेरे आगे वाला कुछ बेचैन दिखाई दे रहा था I उसने पहले मुडा सा दो का एक नोट निकाला फिर कुछ सोचता सा पांच का नोट जेब से बाहर खींचा I इस प्रक्रिया में दस के दो नोट भी बाहर आ रहे I अब उसके हाथ में उसकी पूरी पूँजी थी I

मैं बड़ी जिज्ञासा से उसे देख रहा था I तभी देखा कि न जाने क्या सोच कर उसने अपनी कुल जमा पूँजी देवता के सामने रख दी I हौले से सिर नवा कर ही वह झट से भीड़ में खो गया I चकित और सशंकित मन ले कर मैं बाहर आया I सोचा अपनी अब तक की कमाई देव की भेंट चढ़ा कर वह रिक्शा वाला किसी कोने में खड़ा पछता तो नहीं रहा I पर नहीं सामने सरक पर अपने खाली रिक्शे को एक एइ से लहरा कर खींचते हुए वह ऊंची आवाज़ में कोई भजन गा रहा था I उसके चेहरे पर एक अजीब सुख की छाया थी, संतोष का आनंद था I और मैं – आज मुझे सम्पूर्ण समर्पण का मतलब समझ में आ गया था i

अब बॉस को ये जुमला यानी कम्प्लीट डेडीकेशन बोलने का मौका नहीं दूंगा i मैंने मन ही मन प्रण ले डाला था I

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on — http://ipen-veera.blogspot.in/

मंदिर मैं भक्तों की कतार

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ख़ामोश है दरवाज़ा ( A Memoir - in Hindi )

News4u-Features Desk- गुलाबी शहर जयपुर की जानी मानी मिर्ज़ा इस्माइल रोड पर पांच बत्ती से आगे स्टेशन की ओर जाती सड़क पर कुछ दायें सड़क एक रास्ता सा बना देती है भीतर की तरफ़ । वहीँ खड़ा है एक लम्बा चौड़ा दरवाज़ा जो अपनी ख़ामोशी कभी नहीं तोड़ता । उसमे एक छोटी सी खिड़की भी है पर वह भी चुप-चाप आने जाने वालों को देखती भर रहती है ।

साल में न जाने कितनी आँखें सिर्फ इस दरवाज़े को देखने के लिए ही इधर का रुख करती हैं, लेकिन कोई दस्तक नहीं देता । अंदर का सच सबके भीतर मेहफ़ूज़ है , उसे छेड़े क्यों?

मैं आज उसी दरवाज़े के बहर खड़ी हूँ । न खुले दरवाज़ा , मैं तो सब कुछ आर-पार देख पा रही हूँ। ऊंचा पूरा गुलतुर्रा लाल फूलों से लदा है, बेचारा अमरूद उसकी छाओं में पनप नहीं पाता पर फल बराबर देता है । ये और बात है कि ये फल कभी पक नहीं पाते । शैतान बच्चों की पूरी जमात उनपर निगाह लगाये रहती है ।
गुलतुरे की छाया में आराम से सोया हरे कालीन सा लॉन और उसके किनारे किनारे लगे फूलों के पौधे और उधर अशोक का ऊंचा दरख़्त साथ में दो बहनो सी बतयाती मौलश्री , अपनी जगह वहीँ हैं । दरवाज़े के पास अंदर सभी कमरों पर चिक पड़ी है । भाई लोग पढ़ें या क्रिकेट की चर्चा करें किसी को पता नहीं चलता । हाँ, जब वे बाहर आकर क्रिकेट खेलते या पतंग उड़ाने छत पर जाते तो एक शोर से सारा घर जाग उठता ।

बोगनविलिया और पीले फूलों वाले कनेर के साथ ही हम सब बड़े हुए। एक ओर फूलों से भरा आँचल बिछाये बैठी बेला की लतर रात भर महकती , सुबह सवेरे लुट जाती । सुबह शाम चिकों के पीछे कमरों से घंटी बजने और दबे दबे सुर में आरती का स्वर उभरता और शाम रात में ढल जाती ।

गर्मी में आँगन में बिछी ढेरों चारपाइयां और उनपर लेटी चाचियाँ, ताइयां , भाभियाँ , बहने और बच्चे - कहीं लोरिया , कहीं कहानियां तो कहीं आंसू और शिकायतें । सब हवा में आज तक घुली मिली हैं ।

पढाई वाले कमरे में लड़कियों की खुस-फुस , उनकी हसीं एक अनुशासन पसंद आवाज़ के डर से कहीं दुबक जाती । क्रिकेट कमेंटरी सुनने की चाहत लिए कान या बिनाका गीत माला के प्रेमी भी इसी आवाज़ से सहम बत्ती बंद कर कोने में छिप जाते ।

ताउजी की आवाज़ पर पर्दा करने वाली भाभियाँ , चाचाओं और भाइयों की आवाज़ पर काम के लिए दौड़ पड़ने वाली लड़कियां , लम्बी चौड़ी रसोई में चूल्हे के सामने पसीने में नहाईं भाभियाँ और चाचियाँ , उन सब की चूड़ियों की खनक , आपस की चुहलबाज़ियाँ इस दरवाज़े के पीछे आज तक गूंजती हैं ।

“बस आगई !” का शोर सुबह से कई बार घर मैं गूंजता । लाल रिबन के फूल बनाये छोटी छोटी लडकियां , हरे लाल स्कर्ट में कुछ बड़ी और फिर सलवार कमीज में सजी कुछ और बड़ी लड़कियों के लिए बसें बार बार सड़क पर रूकती , दरवाज़ा देखता रहता ।

लम्बी चौड़ी छत से लटकती रंग बिरंगी साड़ियों की कतार , धुप खाते अचार , बड़ियां और आलू पापड़ के आस पास टहलती लड़कियां , इतनी बातें उनकी कि खत्म ही ना हों कभी । और फिर इसी छत पर बारात का स्वागत भोज , दूसरी छत पर से गालियां गाती घर की महिलाएं और कान लगाकर मज़ा लेते बाराती और घराती । सिल्क के कुर्तों में सजे घर के सभी मर्द बारात की ख़ातिर में माहिर होते ।

कहते हैं आवाज़ें कभी मरती नहीं , हवाओं में सुरक्षित रहती हैं । मेरे आँगन में हर बरस गर्मी में लम्बें चौड़े आँगन में सजे मंडप से गूंजती मुरादाबाद वाले पंडित के मंत्रोच्चार कानों में अभी भी उत्तर आतें हैं ।

हाँ दरवाज़े के पीछे और भी बहुत कुछ है । एक नौकर जो नौकर कम , चौकीदार ज़्यादा है । एक बड़ा सा कमरा जिसे साहब का कमरा कहते थे और जो वाकई कुछ राजसी सा लगता था । इसके अलावा मेरी माँ की दमें से भारी साँसे , बड़ चाची के हाथ का मुसलसल हिलता पंखा , दादी का मंद स्वर में गीता पाठ और बड़े हंडे की चाय , जिसके बिना ज़िन्दगी बदमज़ा होजाती ।

दरवाज़ा खामोश है पर मैं उसमें बोलती आवाज़ों को सुन सकती हूँ जब चाहूँ तभी ।

वीरा चतुर्वेदी

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on http://ipen-veera.blogspot.in/


ख़ामोश है दरवाज़ा

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Wrong, unwarranted controversy over Hindi: Govt

News4u-News Desk- Government on Friday hit back at the opposition parties saying the controversy over promotion of Hindi on social media platform was “wrong and unwarranted” and the circular for giving prominence to the language was issued by the previous UPA dispensation.

It also made it clear that the new government has no intention to impose Hindi on non-Hindi speaking states and wants promotion of all Indian languages in equal footing.

At a press conference, Minister of State for Home Kiren Rijiju said the circular to give prominence to use of Hindi in social media was issued by the previous regime on March 10, this year, “much before the Narendra Modi government assumed charge”.

“It was a circular meant for Hindi-speaking states. The government is clear not to impose Hindi on non-Hindi-speaking states. A wrong and unwarranted controversy is being generated as there was no directive to impose Hindi,” he said.

The normal and routine circular was only reissued on May 27, he said, adding “an attempt is being made to divide the country and create a sense of insecurity.

The comments from the Minister came after parties in Tamil Nadu, including AIADMK and DMK, and CPI(M) opposed it strongly and Congress advised caution on the issue.


Ministry of Home

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Report calls for Hindi to be included in Australian curriculum

News4u-News Desk- Authored by well known Australian journalist Hamish McDonald, the report says Hindi was included as one of the four priority languages in the government’s Asia White Paper last year, along with Chinese, Japanese and Indonesian.

A vast untapped pool of skilled Indian migrants should be used to teach Hindi in Australian schools and universities, according to a report.

The report by Melbourne-based think tank Australia India Institute (AII) argues for the inclusion of Hindi in Australia’s school curriculum, saying it should be an essential part of the Commonwealth’s Asia policy.

Authored by well known Australian journalist Hamish McDonald, the report says hindi was included as one of the four priority languages in the government’s Asia White Paper last year, along with Chinese, Japanese and Indonesian.

“The prospect is for Hindi language teaching to grow organically out of existing programs, with an emphasis on quality rather than a quick rush for larger numbers,” McDonald wrote.

“At school level, the Indian diaspora in Australia is likely to supply the initial demand for Hindi teaching and the supply of teachers as well.”

McDonald wrote the Australian-Indian community with many native speakers with a high level of education, not necessarily in education, could “with the right training” be turned into excellent teachers.

But he wrote such a plan would be contingent on enough resources being put to the case, citing the removal of Korean from teaching programs in Australia, which showed “good intent is not enough”.

The White Paper sets the ambitious target of giving all students access to one of these languages continuously throughout their schooling, presumably by the target date for general “Asia literacy” of 2025, the report said.

In bid to facilitate the introduction of Hindi language teaching in schools, the report further suggested establishing a federal-state team to design a nationally accredited course for native speakers of Hindi who wish to become qualified language teachers, perhaps through a specialised diploma of education.

The team could also consider the introduction of new measures and incentives that facilitate the uptake of tuition in foreign languages in general by Australian high school students, it said.

Establishing an “Australia Bhavan [House]” in a north Indian city for Australian undergraduates to take Hindi courses and extending opportunities for Australian students to spend part of their course at Indian institutions were few other recommendations of the report.

The paper also suggested to re-balance Australia’s diplomatic representation in India.

Establishing two Australian research bases in India, one in New Delhi for political-social-economic studies and the other in Bangalore for scientific and environmental collaboration, were also suggested.

It further asked state governments in Australia to fund a advertising campaign to remind its citizens of what benefits the foreign students and their families bring to the economy.PTI

 

Hindi to be included in Australian curriculum

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