संपूर्ण समर्पण (हिंदी आलेख)

News4u-फ़ीचर डेस्क- (हिंदी आलेख)  आये दिन नित नई स्टोरी की तलाश में मारा मारा फिरता एक जाने माने पत्र का रिपोर्टर मैं , हर कोशिश के बावजूद बॉस से कभी शाबाशी पाने का हक़दार न बन पाया था Iहर बार एक ही जुमला, “ अरे काम करते हो तो पूरे डेडिकेशन से करोI ये आधे अधूरे वाक्य, धुंधले कैरीकेचर, कहानी कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म कुछ पता नहींI ध्यान दो बाबा ध्यान दो काम पर, खाना, पीना, सोना, फॅमिली सब भूल कर कम्पलीट डेडीकेशन होगा तभी न टॉप स्टोरी बनेगी ? “

ये कम्पलीट डेडीकेशन, एक गाली बन गया था मेरे लिए जो बॉस जब चाहे मुझपर उछाल मारता था और मैं उसे अपने से चिपकाए गली मोहल्ले भटकता रहता था I एक दिन की बात, बहुत मायूस हो कर मैं एक मंदिर में जा घुसा I शायद इन देवता की मानता कुछ अधिक ही थी I दर्शन करने वालों की लम्बी कतार पूर्ण श्रध्दा से धीरे धीरे आगे की ओर सरक रही थी I जेब में हाथ डाला, एक सौ का नोट हाथ आया I घबरा कर उसे वापस ठूंसा, अभी स्कूटर में पेट्रोल डलवाना है I देखूं कुछ चेंज है कि नहीं I एक बार फिर जो जेब टटोली तो पांच का एक भारी सा सिक्का उँगलियों से आ टकराया I स्वस्ति की सांस ले कर कतार में जा मिला I

मेरे आगे एक मैली सी लुंगी और कमीज़ पहने जो व्यक्ति खड़ा था वह अपने रूपरंग से रिक्शावाला लग रहा था I कतार धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी I अब हम देव मूर्ति के ठीक सामने आ पहुंचे थे I मेरा पांच का सिक्का तैयार था, पर मेरे आगे वाला कुछ बेचैन दिखाई दे रहा था I उसने पहले मुडा सा दो का एक नोट निकाला फिर कुछ सोचता सा पांच का नोट जेब से बाहर खींचा I इस प्रक्रिया में दस के दो नोट भी बाहर आ रहे I अब उसके हाथ में उसकी पूरी पूँजी थी I

मैं बड़ी जिज्ञासा से उसे देख रहा था I तभी देखा कि न जाने क्या सोच कर उसने अपनी कुल जमा पूँजी देवता के सामने रख दी I हौले से सिर नवा कर ही वह झट से भीड़ में खो गया I चकित और सशंकित मन ले कर मैं बाहर आया I सोचा अपनी अब तक की कमाई देव की भेंट चढ़ा कर वह रिक्शा वाला किसी कोने में खड़ा पछता तो नहीं रहा I पर नहीं सामने सरक पर अपने खाली रिक्शे को एक एइ से लहरा कर खींचते हुए वह ऊंची आवाज़ में कोई भजन गा रहा था I उसके चेहरे पर एक अजीब सुख की छाया थी, संतोष का आनंद था I और मैं – आज मुझे सम्पूर्ण समर्पण का मतलब समझ में आ गया था i

अब बॉस को ये जुमला यानी कम्प्लीट डेडीकेशन बोलने का मौका नहीं दूंगा i मैंने मन ही मन प्रण ले डाला था I

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on — http://ipen-veera.blogspot.in/

मंदिर मैं भक्तों की कतार

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ख़ामोश है दरवाज़ा ( A Memoir - in Hindi )

News4u-Features Desk- गुलाबी शहर जयपुर की जानी मानी मिर्ज़ा इस्माइल रोड पर पांच बत्ती से आगे स्टेशन की ओर जाती सड़क पर कुछ दायें सड़क एक रास्ता सा बना देती है भीतर की तरफ़ । वहीँ खड़ा है एक लम्बा चौड़ा दरवाज़ा जो अपनी ख़ामोशी कभी नहीं तोड़ता । उसमे एक छोटी सी खिड़की भी है पर वह भी चुप-चाप आने जाने वालों को देखती भर रहती है ।

साल में न जाने कितनी आँखें सिर्फ इस दरवाज़े को देखने के लिए ही इधर का रुख करती हैं, लेकिन कोई दस्तक नहीं देता । अंदर का सच सबके भीतर मेहफ़ूज़ है , उसे छेड़े क्यों?

मैं आज उसी दरवाज़े के बहर खड़ी हूँ । न खुले दरवाज़ा , मैं तो सब कुछ आर-पार देख पा रही हूँ। ऊंचा पूरा गुलतुर्रा लाल फूलों से लदा है, बेचारा अमरूद उसकी छाओं में पनप नहीं पाता पर फल बराबर देता है । ये और बात है कि ये फल कभी पक नहीं पाते । शैतान बच्चों की पूरी जमात उनपर निगाह लगाये रहती है ।
गुलतुरे की छाया में आराम से सोया हरे कालीन सा लॉन और उसके किनारे किनारे लगे फूलों के पौधे और उधर अशोक का ऊंचा दरख़्त साथ में दो बहनो सी बतयाती मौलश्री , अपनी जगह वहीँ हैं । दरवाज़े के पास अंदर सभी कमरों पर चिक पड़ी है । भाई लोग पढ़ें या क्रिकेट की चर्चा करें किसी को पता नहीं चलता । हाँ, जब वे बाहर आकर क्रिकेट खेलते या पतंग उड़ाने छत पर जाते तो एक शोर से सारा घर जाग उठता ।

बोगनविलिया और पीले फूलों वाले कनेर के साथ ही हम सब बड़े हुए। एक ओर फूलों से भरा आँचल बिछाये बैठी बेला की लतर रात भर महकती , सुबह सवेरे लुट जाती । सुबह शाम चिकों के पीछे कमरों से घंटी बजने और दबे दबे सुर में आरती का स्वर उभरता और शाम रात में ढल जाती ।

गर्मी में आँगन में बिछी ढेरों चारपाइयां और उनपर लेटी चाचियाँ, ताइयां , भाभियाँ , बहने और बच्चे - कहीं लोरिया , कहीं कहानियां तो कहीं आंसू और शिकायतें । सब हवा में आज तक घुली मिली हैं ।

पढाई वाले कमरे में लड़कियों की खुस-फुस , उनकी हसीं एक अनुशासन पसंद आवाज़ के डर से कहीं दुबक जाती । क्रिकेट कमेंटरी सुनने की चाहत लिए कान या बिनाका गीत माला के प्रेमी भी इसी आवाज़ से सहम बत्ती बंद कर कोने में छिप जाते ।

ताउजी की आवाज़ पर पर्दा करने वाली भाभियाँ , चाचाओं और भाइयों की आवाज़ पर काम के लिए दौड़ पड़ने वाली लड़कियां , लम्बी चौड़ी रसोई में चूल्हे के सामने पसीने में नहाईं भाभियाँ और चाचियाँ , उन सब की चूड़ियों की खनक , आपस की चुहलबाज़ियाँ इस दरवाज़े के पीछे आज तक गूंजती हैं ।

“बस आगई !” का शोर सुबह से कई बार घर मैं गूंजता । लाल रिबन के फूल बनाये छोटी छोटी लडकियां , हरे लाल स्कर्ट में कुछ बड़ी और फिर सलवार कमीज में सजी कुछ और बड़ी लड़कियों के लिए बसें बार बार सड़क पर रूकती , दरवाज़ा देखता रहता ।

लम्बी चौड़ी छत से लटकती रंग बिरंगी साड़ियों की कतार , धुप खाते अचार , बड़ियां और आलू पापड़ के आस पास टहलती लड़कियां , इतनी बातें उनकी कि खत्म ही ना हों कभी । और फिर इसी छत पर बारात का स्वागत भोज , दूसरी छत पर से गालियां गाती घर की महिलाएं और कान लगाकर मज़ा लेते बाराती और घराती । सिल्क के कुर्तों में सजे घर के सभी मर्द बारात की ख़ातिर में माहिर होते ।

कहते हैं आवाज़ें कभी मरती नहीं , हवाओं में सुरक्षित रहती हैं । मेरे आँगन में हर बरस गर्मी में लम्बें चौड़े आँगन में सजे मंडप से गूंजती मुरादाबाद वाले पंडित के मंत्रोच्चार कानों में अभी भी उत्तर आतें हैं ।

हाँ दरवाज़े के पीछे और भी बहुत कुछ है । एक नौकर जो नौकर कम , चौकीदार ज़्यादा है । एक बड़ा सा कमरा जिसे साहब का कमरा कहते थे और जो वाकई कुछ राजसी सा लगता था । इसके अलावा मेरी माँ की दमें से भारी साँसे , बड़ चाची के हाथ का मुसलसल हिलता पंखा , दादी का मंद स्वर में गीता पाठ और बड़े हंडे की चाय , जिसके बिना ज़िन्दगी बदमज़ा होजाती ।

दरवाज़ा खामोश है पर मैं उसमें बोलती आवाज़ों को सुन सकती हूँ जब चाहूँ तभी ।

वीरा चतुर्वेदी

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on http://ipen-veera.blogspot.in/


ख़ामोश है दरवाज़ा

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हमसुख़न (उर्दू शायरी )

News4u-Entertainment Desk- Author- humsukhan-scc.blogspot.com

उसके बन्दों से मुझे जिस दम मोहब्बत हो गयी
आसमां से इक सदा आयी इबादत हो गयी ई I

हर्फ़ हर्फ़ सोचिये, लफ्ज़ लफ्ज़ बोलिए
ग़ौर ओ फ़िक्र कीजिये, फिर ज़ुबान खोलिए I

बारे दुनिया में रहो ग़मज़दा या शाद रहो ,
ऐसा कुछ कर के चलो यां कि बहुत याद रहो I

जिस दिन ये सूरज मेरी मुट्ठी में होगा,
उजाले बाँट दूंगा शहर भर में मैं I

ये उसका सलीक़ा है दान करने का ,
वो जिससे भी शर्त लगाता है हार जाता है I

Courtesy- —-humsukhan-scc.blogspot.com


Shayari

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हमसुख़न (उर्दू शायरी )

News4u-Entertainment Desk- Author-  humsukhan-scc.blogspot.com

मुझे अपने ज़प्त पे नाज़ था सरे बज़्म रात ये क्या हुआ ,
मेरी आँख कैसे छलक गई मुझे रंज है ये बुरा हुआ I
जो नज़र बचा के गुज़र गए मेरे सामने से अभी अभी ,
ये मेरे ही शहर के लोग थे , मेरे घर से घर है मिला हुआ I

मेरी ज़िंदगी के चराग़ का ये मिज़ाज कोई नया नहीं ,
अभी रौशनी अभी तीरगी, न जल हुआ न बुझा हुआ I

मुझे जो भी दुश्मने जां मिला वो ही पुख्ताकारे जफ़ा मिला ,
न किसी की ज़र्ब गलत पड़ी न किसी का तीर खता हुआ I

मुझे आप क्यों न समझ सके, कभी अपने दिल से भी पूछिये ,
मेरी दास्ताने हयात का तो वर्क़ वर्क़ है खुला हुआ I

मुझे हमसफ़र भी मिला कोई तो शिकस्ताहाल मेरी तरह ,
कहीं मंज़िलों का थका हुआ, कहीं रास्ते में लुटा हुआ I

मुझे इक गली में पड़ा हुआ किसी बदनसीब का ख़त मिला ,
कहीं ख़ूने दिल से लिखा हुआ, कहीं आंसुओं से मिटा हुआ ,

हमें अपने घर से चले हुए सरे राह उम्र गुज़र गई ,
कोई जुस्तजू का सिला मिला, ना सफ़र का हक़ अदा हुआ I

Courtesy- —-humsukhan-scc.blogspot.com


Arun Jaitley Flags off Relief Material to Nepal

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हमसुख़न (उर्दू शायरी )

>News4u-Entertainment Desk- Author- humsukhan-scc.blogspot.com

चंद अशआर

उफ़ री शबनम, इस क़दर नादानियाँ ?
मोतियों को घास पर फैला दिया I

सुबह को राज़े गुलो शबनम खुला
हँसने वाले रात भर रट रहे I

बावफ़ा था तो मुझे पूछने वाले भी न थे
बेवफ़ा हूँ तो हुआ है नाम भी घर घर मेरा I

बढ़ते रहेंगे झूमती खुशबू के क़ाफ़िले
दस्ते सितम ने फूल मसल भी दिए तो क्या I

मैं अपनी सांस में खुसबू उसीकी पाता हूँ
अब इससे बढ़ के वह मेरे क़रीब क्या होगा I

शीशम के खुश्क पत्ते यूँ गिर के टहनियों से धरती पे आ रहे हैं
जैसे मेरे इरादे दुनिया से मात खाकर आँसूं बहा रहे है I

Courtesy- —-humsukhan-scc.blogspot.com


Shayari

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पिता (कहानी )

News4u-Hindi desk-(कहानी )- क्या आप मानेगे कि पिता की मौत के लगभग साठ बासठ साल बाद एक बेटी अपने पिता को खोजने समझने की कोशिश में लगी है I आप सवाल करेंगे कि यह काम पहले क्यों नहीं हो सका, और नहीं हुआ तो अब क्या ज़रुरत आन पड़ीI तो सबब बना हमारे परिवार का वो खोज अभियान जो हर दुसरे चौथे रोज़ कभी चाभी , कभी रूमाल तो कभी किसी ज़रूरी बिल के खोजने के लिए पूरे घर में चलाया जाता है और आरोप प्रत्यारोप की गूंज से घर लोक सभा सा दिखाई देने लगता है I

ऐसे ही एक दिन के तीसरे पहर में कागजों को उलटते पलटते मेरे हाथ लगी एक तस्वीर, एक बहुत पुरानी पेंटिंग/ और बस मैं उसे हाथ में लेकर बैठी ही रह गयी/ बचपन की यादों में यही तस्वीर बड़े ही खूबसूरत फ्रेम में सजी हर बदलते शहर में घर के खास कमरे की मुख्य दीवार पर सजी रहती थी I तमाम तस्वीरों के बीच यही तस्वीर मुझे न जाने क्यों बहुत आकर्षक लगती थी I

इसमें चित्रित था एक बूढा जिसकी मुस्कान से सजी आँखों के सामने रखी थी एक अदद खुली किताब और एक शराब का प्याला I इन तीनों से गाफिल सामने एक हूर नृत्य मुद्रा में खडी मुस्करा रही थी I ये तस्वीर मुझे मंत्रमुग्ध कर जाती थी, केवल कलाकार की बेहतरीन कृति के नाते नहीं बल्कि जो पंक्ति तस्वीर के नीचे उकेरी गयी थी वह मेरे मन मष्तिष्क में पैठ सी गयी थी I शब्द उम्र खय्याम के थे ” वी डांस अलोंग डेथ’स आइसी ब्रिंक , बट इस द डांस लेस फुल ऑफ़ फन?” मैं समय के साथ धीरे धीरे इन शब्दों का अर्थ भी समझने लगी और ये तस्वीर मेरे लिए अनमोल बन गयी I

मुझे याद आया की कैसे हमारे घर के सभी कमरों में पिता की पसंदीदा तस्वीरें छाई रहतीं थीं I बुद्ध के जन्म से ले कर उनकी म्रत्यु तक के चित्रों के साथ साथ उम्र खय्याम की रचनाओं पर आधारित अनगिनत कृतिया दिन रात, सोते जागते हमारे गिर्द होतीं I समझिये हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकीं थी वो I पिता त्रिलोकीनाथ शुक्ल, जिलाधीश थे, हर दो साल में तबादले के साथ हमारा पूरा परिवार,(तस्वीरें जिसमे खास अहमियत रखती थीं) शहर बदल देता और जिंदगी एक नया मोड़ ले आगे बढ़ जाती I

आज उनमे से ही एक तस्वीर मेरे हाथ में थी जिसे मैंने पिता की मृत्यु के बाद आये जिंदगी के भूचाल से किसी तरह बचाकर रखा था I आज अपने अकेलेपन में यह तस्वीर मुझे उस व्यक्ति से बरबस जोड़ रही थी जिसे मैंने शायद जानने समझ्ने की कोशिश ही न की I अपने नन्हें मन में उनकी एक तस्वीर उतार उस पर हमेशा के लिए पर्दा डाल आगे बढ़ चली थी मैं I तभी तो आज उन्हें बस पिता ही कह कर संबोधित कर रही हूँ, पापा, बाबूजी या डैड नहीं I

असल में पिता को कुछ कहकर पुकारने का कभी मौका ही नहीं आया I आपस में हम उन्हें वही कहते जो सम्मिलित परिवारों की रीति है I बुआ, चाचा उन्हें दादा भाई साहेब कहते और हम उनका अनुकरण करते बिना प्रश्न किये I आज कभी कभी अपनी पोतियों को अपने पापा के गले में झूल कर उनके सुर में सुर मिलाते देखती हूँ तो अचानक हकबका कर मन ही मन अपने से पूछती हूँ -मैं ऐसा कभी क्यों नहीं कर पाई ? सिर्फ पिता से वे मेरे बाबूजी या पापा क्यों नहीं बन पाए ? कहाँ चूक गयी थीं मैं, या फिर पिता ने यह मौका ही नहीं दिया, पता नहीं I

सच कहूँ तो पिता हम लोगों के लिए एक छाते की तरह थे I उनकी छाया तले हम महफूज़ थे I नौकर, चाकर, गाडी बंगला सब कुछ था पर वे स्वयं हमारे बीच कभी नहीं होते I होते भी तो हम उन की धीर गंभीर, कुछ कड़े स्वभाव से इतने घबराये रहते कि उनके ऑफिस से आने की आहट सुनते ही इधर उधर लोप हो जाते या पढने बैठ जाते I उनके साथ होता चमकदार चपरास पहने एक अर्दली और लाल रंग के कपडे में बंधी फाइलें I वे खाने बैठते तो भी माँ की उपस्थिति से अनजान वे अपने आप से ही तर्क वितर्क सा करते रहते, मानो कोई केस सुलझा रहें हों I

जब वे किसी वारदात के बाद मौका देखने जाते तो हमारी बन आती I हम जैसे आज़ाद हो जाते I घर के अहाते की दीवारों पर चढ़ कर सर्कस सा करते हुए चक्कर लगाना, आसपास के बच्चों को इकठठा कर कभी सितोलिया तो कभी कभी क्रिकेट भी खेलना हमारा शगल होता I लौटकर उन्होंने कभी नहीं पुछा कि हम क्या करते रहे उनकी गैरहाजिरी में या कि हम ठीक से पढाई कर रहें हैं या नहीं I हाँ एक बार, बस एक बार मैंने उनसे अपने स्कूल में होने वाले अंग्रेजी नाटक मर्चेंट ऑफ़ वेनिस में पोर्शिया का रोल करने की अनुमति मांगी थी I गाँव के स्कूल में शेक्सपियर का नाटक एक अनहोनी थी I पर मैं देखती रह गयी जब पिता बेहद खुश नज़र आये I यहाँ तक कि उन्होंने मेरे सर पर थपकी देकर कोई डायलॉग सुनाने की फरमाइश भी कर दी I

उत्साह से पागल मैंने उन्हें कोर्ट सीन से पूरी स्पीच ही सुना डाली I लगा वे चमत्कृत हैं, फिर भी बिना कुछ बोल मुस्कुराते हुए वे अपने कमरे में चले गए I मैंने तब शायद पहली बार उनसे कुछ नजदीकी महसूस की थी I वो प्यार की थपकी, इकलौती जान , आज भी मुझे याद है I पर वह पल दुबारा नहीं आया I मैं पिता की ओर से उदासीन बनी रही I मैंने कहा न पिता हमारे लिए ही नहीं सम्मिलित परिवार, यानी वो शहर जहाँ हम अक्सर त्यौहार मनाने इकठा होते, वहां के हर सदस्य का सुख दुःख भी पूरी तरह बांटते I जब एक चाचा हर दुसरे हफ्ते गुस्से और सनक में आकर तहसीलदार पद से इस्तीफा दे देते तो पिता ही उनकी वृहद फॅमिली को संकट से बचाते I

उनकी पहुँच ऊपर तक थी, अपनी इमानदारी और सत्यनिष्ठा के कारण वे हर ओर आदर सम्मान पाते I पुलिस विभाग में पदस्थ बड़े भाई पर एक बार जब कुछ ग़लत इलज़ाम लगे, तब उनके सीनियर अफसरों ने यही कहकर सभी इलज़ाम खारिज कर दिए कि शुकुलजी का बेटा ऐसा कभी कर ही नहीं सकता I हमारे लिये वे उन कहानियों के पात्र थे जिन्हें सिर्फ कल्पना में ही गढ़ा जाता है, छु कर महसूस नहीं किया जाता I

तो आज तकरीबन छ दशक बाद उमर खय्याम की इस रुबाई और इस पेंटिंग के ज़रिये मैं अपने पिता को खोजने चली हूँ I पिता ने न जाने कितनी बार इस तस्वीर को छुआ होगा I मैं उसी पर हाथ फेर कर उस छुअन को महसूस करना चाहती हूँ जो इसके पहले मैंने कभी की ही नहीं I विडंबना ये है कि माँ को मैं आज भी दिन में कई बार याद कर लेती हूँ I पर पिता की स्मृति से नाराज़ ही बनी रही आई हूँ अब तक I ऐसा क्यों हुआ इसका कारण जानने ही तो बैठीं हूँ इस वक़्त I

याद आती है पिता के कमरे से आती उनकी गरज तरज, जब वे माँ को फिजूलखर्ची करने पर नाराज़ होते I माँ हमारी बहुत प्यारी नाजुक और खूबसूरत थीं I लम्बे चौड़े हमारे परिवार के अलावा चचेरे फुफेरे भाई बहन और फिर पीर फकीरों की आवभगत की व्यवस्था पिता की अच्छी पर सूखी तनखा में शायद पूरी तरह हो नहीं पाती और पिता गुस्सा निकालते माँ पर I उस समय मन में आता जाकर माँ के सामने कवच बन कर खड़ी हो जाऊं I पर इतनी हिम्मत थी कहाँ I

तो मैंने मन ही मन पिता को निष्ठुर और निर्दयी मान कर एक लकीर खींच डाली उनके और अपने बीच यह लकीर आज तक कभी मिटाने की कोशिश भी नहीं की थी मैंने/ इसका कभी ज़िक्र ही नहीं किया I बड़े भाई बहन शायद मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते थे इसलिए इस विषय पर हमारी कभी चर्चा नहीं हुई I पर आज याद आ रही हैं बुद्ध और उमर खय्याम के साथ लगी राम लक्ष्मण सीता की तस्वीरें, जिन पर पिता की परम आस्था थी I पिता ने शायद जीवन की नश्वरता और निरर्थकता को खूब समझ लिया था I

वे जैसे हम सब के साथ थे भी और नहीं भी I रूपया पैसा ज़मीन जायदाद कुछ भी पा सकते थे वे, पर उन्होंने सादा और सच्चाई का जीवन जिया/ कहते हैं कि जब उन्हें लगा कि अंत समय आन पहुंचा है तो वे स्वयं ही ज़मीन पर लेट गए थे I जीवन संग्राम को समाप्त मान अपने खेमे में जाये जैसे कोई योधा I पर नहीं उन्होंने उमर् खय्याम को भी जीवन में पूरा उतारा था I मौत तो अंतिम सत्य है ही पर जन्म और मृत्यु के बीच का वक्फा उसका तो पूरा लुत्फ़ उठाना ही जीवन की सार्थकता है I “इज द डांस लेस फुल ऑफ़ फन” I

मैंने उन्हें लोक नर्तकों के नृत्य का आनंद लेते घंटों खड़े देखा था I उनके मातहत कुर्सी लिए पीछे खड़े रहते, पर वे तो जैसे एकटक उन नर्तकों की कला का रसास्वादन करते दूर कहीं खो जाते I कानून की फाइलों से दूर, रूपये पैसे की ज़रूरतों से गाफ़िल वे एक दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाते I यही नहीं बहनों को कीट्स या टेनिसन पढाते हुए या फिर शेक्सपियर का नाटक समझाते हुए वे इतने उत्साहित और ऊर्जावान लगते कि लगता वो अपने टीसते घुटनों का दर्द भी कहीं दूर छोड़ आये हैं I

सोचती हूँ क्या कभी वे ऐसा कोई साथी पा सके होंगे जिनके साथ बैठ कर जिंदगी को सवांरने वाली इन रचनाओं और कलाओं को डिस्कस कर सकें I हाँ बुद्ध, उमर खय्याम शेक्सपियर और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बीच कैसा तालमेल बिठा कर चल रहे थे मेरे पिता, आज समझ में आ रहा है I राम में उनकी आस्था अडिग थी हमें गाँव की रामलीला में जाने से उन्होंने कभी नहीं रोका I

शायद आज भी हम सब भाई बहन इसीलिए राम में श्रध्दा रखते हैं I पर वे अपनी पूजा एकदम एकांत कमरे में करते थे, ऊंची आवाज़ में देव स्तुति पाठ या श्लोक उच्चार उनका तरीका नहीं था I हाँ हर मौसम का रंग उन्हें ज़रूर याद रहता I बसंत पंचमी पर पीले कपडे पहनना ज़रूरी होता परिवार के लिए I बरसात में पिकनिक होती और सर्दियों में कैंम्प्फाएर और कवी सम्मलेन तथा मुशायरे I पिता कविता पाठ का पूरा मज़ा लेते और बेटियों को कविता लिखने के लिए उत्साहित भी करते I वास्तव में पिता ने ही परिवार को कला और साहित्य की विरासत सौपीं थी ये अब समझ में आ रहा है I

मैं जब छोटी थी तब बहनों को ड्राइंग सिखाने व् संगीत सिखाने अलग अलग टीचर आते I बड़ी बहनें बताती हैं कि अलाहाबाद में जब कभी वे नाव पर सैर को जाती तो पिता की हिदायत होती कि वे कागज़ पेंसिल साथ ले जाएँ और आस पास के दृश्य कागजों पर उतारें I आज के माँ बाप की तरह उनहोंने बच्चों पर किसी बात का दवाब नहीं डाला I पर वो बीज सभी भाई बहनों में कहीं न कहीं प्रस्फुटित हुआ I अगर बड़ी बहने पेंटिंग या संगीत में माहिर निकली तो बाक़ी भी सभी साहित्य और संगीत से सदा जुड़े रहे I

एक बात और घर में ढेर सारे रिकॉर्ड भी थे, कुछ केसीडे और सहगल के गीत तो कुछ नारायण राव व्यास के संगीत से सजे I हमारी याद में तो पिता ने कभी ग्रामोफ़ोन नहीं बजाया , उन्हें वक़्त ही नहीं मिला I बड़े हो कर हम सब अनजाने ही यह मान बैठे कि उन्हें संगीत नहीं भाता I वे घर लौटते तो हमारा रेडियो चुप हो जाता I खासकर मैं इस बात से बहुत खुन्नस खाती I मेरा मन करता जोर से रेडियो बजे और उसकी आवाज़ में आवाज़ मिला कर चीख चीख कर गाऊँ I पर मन मार कर रह जाती I

हाँ एक बार ऐसा हुआ कि पिता कब घर पहुँच कर हमारे कमरे की ओर चल पड़े, हम में से किसी को पता नहीं चला I हम सब लाजवाब फिल्म के लाजवाब गीत में खोये जो हुए थे I गीत था “ज़माने का दस्तूर है ये पुराना, निगाहें मिला कर निगाहें चुराना I अचानक हमारी तन्द्रा टूटी तो देखा पिता रेडियो के ठीक सामने खड़े हैं, हम सब हतप्रभ, करे तो क्या I तभी गीत के बोल गूजे “बहुत हमने रोका मगर दिल न माना” और पिता भी जैसे तन्द्रा से जागे बोले ठीक कहा है ” बहुत हमने रोका मगर दिल न माना” वही दोहराते हुए वे अपने कमरे में चले गए I

ऐसा लगा गीत ने कहीं उन्हें भीतर तक छु लिया था I ये एक अनोखा रूप था पिता का, पर हम उन्हें समझ कहाँ पाए I आज जब कुछ लिखती पढ़ती हूँ तो लगता है ये आदत ये थोडा बहुत लिखने की क्षमता मुझे पिता से ही तो मिले है I किताबों का अम्बार लगा होता था हमारे घर में I हर विषय की किताबे वीपी से निर्बाध चली आती हमारे संसार को जगमगाने I उसी ज्ञान के दरिया में डूबते उतराते जिंदगी की तमाम तबलातों से लड़ने का माद्दा आया हम में I कितने ही दुःख झेले पर हम में से किसी ने भी अपना धीरज और विनोदप्रियता नहीं खोई i

पिता की यही विरासत रही हम सब के लिए I माँ ने हम सब को अपने पराये सबके साथ प्यार से रहना सिखाया, उन्हों ने कभी किसी को बुरा नहीं कहा I पिता ने हमें जीवन को भरपूर जीने की राह दिखाई I मैं उनकी दिखाई राह पर चलती चली गयी पर उनकी अदृश्य उपस्थिति को कभी स्वीकार नहीं कर पाई I पर आज उमर खय्याम से जुडी इस तस्वीर ने मुझे अपनी भूल का एहसास कराया है I मैं पिता से हमेशा नाराज़ रही उन्हें जाने बिना/ अपने जीवन में उनकी उपस्थिति को नकारते हुए I

आज बरसों बाद मैंने जैसे सच्चाई जानी है I एक झूठ को जीती रही मैं इतने बरस I अपने अन्दर पिता के खिलाफ एक ग्रंथि को पाले मैं कैसे जी सकी आजतक आश्चर्य होता है I वज़ह येही है कि मैंने कभी अपनी भावनाओं को किसे के साथ साझा नहीं किया, हां पिता के नाम को छाते की तरह इस्तेमाल मैंने भी किया I कलेक्टर की बेटी होने का रॉब देने से तो नहीं चूकी पर उसे भुला बैठी जिसने जीने का ढंग सिखाया बिना सामने आये I
आज मैं अपनी मूढ़ता पर चकित तो हूँ ही बहुत शर्मिंदा भी हूँ I किस मुंह से कहूं कि पिता आप जहाँ भी हों अपनी इस अहसानफरामोश बेटी को माफ़ कर दें I जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर अपनी भूल के लिए किन शब्दों में क्षमा याचना करूँ , ये समझ नहीं पा रही क्या माफ़ी मिलेगी !!!

लेखिका - वीरा चतुर्वेदी

Umar Khyaam

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सुरों की पुकार (कहानी )

News4u-Hindi desk-(कहानी )- संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह थे करीम खां I बेटी का नाम था शारदा I रामपुर या आस पास कहीं भी इन बेमेल नामों पर कोई एतराज़ नहीं था I बाबा संगीत के पुजारी थे और हर सुबह शारदा मंदिर की अनगिनत सीढियां बिना रुके चढ़ जाते थे I नई रागों को जन्म देना, नए साजों को गढ़ना बाबा करीम खां का शौक़ था I

शारदा उनके अनेक शिष्यों में एक थी I बांसुरी से उसे बेहद लगाव था I

ऐसे में भास्कर नामक एक नौजवान सितार की तालीम लेने बाबा के पास आ पहुंचा I काले घुंघराले बाल और बड़ी बड़ी आँखों वाला ये युवक बाबा के परिवार का एक अंग बन गया I वह सितार बजाने में प्रवीण होता गया और शारदा उसकी ओर खिंचती गयी I बाबा को लगा उन्हें उनका वारिस मिल गया है I उन्होंने शारदा का हाथ भास्कर के हाथ में थमा दिया I न निकाह हुआ न साथ फेरे केवल सरस्वती माँ के चरणों में फूल रख कर एक दुसरे को माला पहना दी I

घर में एक बेटा भी आ गया तो बाबा जैसे बेटी और संगीत के प्रति निश्चिन्त हो गए I लेकिन भास्कर को बंधन में रहना गवारा नहीं था I वह सितार के सुरों के साथ हवा में उड़ना चाहता था I विभिन्न समारोहों से होता हुआ उसका नाम देश विदेश में फैल चुका था I ऐसे में ही एक बार भास्कर एक विदेशिनी को लेकर घर लौटा i

जेन उसकी प्रशंसक थी और उसे अमेरिका ले जाना चाहती थी I बाबा ने आज्ञा तो दे दी पर साथ ही ताकीद की “ अपने संगीत और प्यार में कभी मिलावट मत करना बेटा”I वक़्त गुज़रता गया बाबा का अंत समय भी आ गया, भास्कर कहीं दूर विदेश में था. इधर उसका देश आना कम होता जा रहा था I जाते वक़्त बाबा ने शारदा को इतना ही समझाया कि वह कभी संगीत का साथ न छोड़े क्यों कि वही उसका साथ अंत तक निभायेगा I

माँ को बाबा की विरासत के साथ छोड़ शारदा मुंबई आ गयी I भास्कर आता जाता रहा पर गृहस्थी में कभी रमा नहीं I उसके प्रशंसकों की अपनी दुनिया थी I बेटा भी बड़ा हो रहा था और पिता की शह पाकर गिटार बजाना सीख रहा था I शारदा ने भी कुछ एक शिष्यों को संगीत सिखाना शुरू कर दिया था I एक बार विदेश की एक संगीत सभा में जब भास्कर ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को प्राचीन नियम कायदों में ज़कड़ा हुआ बताया तो शारदा ने उसका कड़ा विरोध किया I बाद में इसी बात को लेकर दोनों में तकरार बढती गयी I भास्कर का कहना था कि वह ग्रो करना चाहता है

चाहता है और इसके लिये नए प्रयोग ज़रूरी हैं I दोनों अपने अपने संसार में जीते रहे और तभी खबर आई कि भास्कर को कैंसर हो गया है I उसके प्रशंसक दूर हो गए हैं और वह विदेश में मुफ़लिसी में जी रहा है I इसी हाल में भास्कर देश लौटा पर शारदा से दूर ही रहा I एक दिन अचानक कुछ नवयुवकों ने आ कर शारदा से विनती की कि वे भास्कर की सहायता के लिए एक संगीत समारोह कर रहे हैं और चाहते हैं कि शारदा उसमें हिस्सा लें I

शारदा मना कर देती है उसे मालूम है कि वे लोग उसे एक सरप्राइज आइटम की तरह पेश करना चाहते हैं क्योंकि वह भास्कर की पत्नी जानी जाती है I

समारोह का प्रसारण टीवी पर लाइव हो रहा है I कोई भी बड़ा कलाकार भाग नहीं ले रहा तो सभागार सूना पड़ा है टिकट खिड़की ख़ाली है तभी कैमरा घूमता हुआ भास्कर के चेहरे पर आ रुकता है I शारदा को वह रक्तहीन, श्रीहीन चेहरा झकझोर देता है I उसको लगता है की उसका संगीत भास्कर को अवश्य बचा लेगा I एक पल में फैसला लेकर अपनी बांसुरी के साथ वह सभागार की ओर दौड़ पड़ती है I

टीवी पर शारदा के आने की घोषणा शहर में हंगामा कर देती है I वह कब स्टेज पर पहुंची कब उसकी बांसुरी ने हवाओं को बदल दिया पता नहीं I बस भास्कर उसे एक टक निहार रहा था, उसकी आँखों में मंडराता मौत का साया लोप हो चुका था I संगीत ने मौत को मात दे दी थी …

लेखिका - वीरा चतुर्वेदी

सुरों की पुकार (कहानी )

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