हमसुख़न (उर्दू शायरी )

News4u-Entertainment Desk- Author-  humsukhan-scc.blogspot.com

मुझे अपने ज़प्त पे नाज़ था सरे बज़्म रात ये क्या हुआ ,
मेरी आँख कैसे छलक गई मुझे रंज है ये बुरा हुआ I
जो नज़र बचा के गुज़र गए मेरे सामने से अभी अभी ,
ये मेरे ही शहर के लोग थे , मेरे घर से घर है मिला हुआ I

मेरी ज़िंदगी के चराग़ का ये मिज़ाज कोई नया नहीं ,
अभी रौशनी अभी तीरगी, न जल हुआ न बुझा हुआ I

मुझे जो भी दुश्मने जां मिला वो ही पुख्ताकारे जफ़ा मिला ,
न किसी की ज़र्ब गलत पड़ी न किसी का तीर खता हुआ I

मुझे आप क्यों न समझ सके, कभी अपने दिल से भी पूछिये ,
मेरी दास्ताने हयात का तो वर्क़ वर्क़ है खुला हुआ I

मुझे हमसफ़र भी मिला कोई तो शिकस्ताहाल मेरी तरह ,
कहीं मंज़िलों का थका हुआ, कहीं रास्ते में लुटा हुआ I

मुझे इक गली में पड़ा हुआ किसी बदनसीब का ख़त मिला ,
कहीं ख़ूने दिल से लिखा हुआ, कहीं आंसुओं से मिटा हुआ ,

हमें अपने घर से चले हुए सरे राह उम्र गुज़र गई ,
कोई जुस्तजू का सिला मिला, ना सफ़र का हक़ अदा हुआ I

Courtesy- —-humsukhan-scc.blogspot.com


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