ख़ामोश है दरवाज़ा ( A Memoir - in Hindi )

News4u-Features Desk- गुलाबी शहर जयपुर की जानी मानी मिर्ज़ा इस्माइल रोड पर पांच बत्ती से आगे स्टेशन की ओर जाती सड़क पर कुछ दायें सड़क एक रास्ता सा बना देती है भीतर की तरफ़ । वहीँ खड़ा है एक लम्बा चौड़ा दरवाज़ा जो अपनी ख़ामोशी कभी नहीं तोड़ता । उसमे एक छोटी सी खिड़की भी है पर वह भी चुप-चाप आने जाने वालों को देखती भर रहती है ।

साल में न जाने कितनी आँखें सिर्फ इस दरवाज़े को देखने के लिए ही इधर का रुख करती हैं, लेकिन कोई दस्तक नहीं देता । अंदर का सच सबके भीतर मेहफ़ूज़ है , उसे छेड़े क्यों?

मैं आज उसी दरवाज़े के बहर खड़ी हूँ । न खुले दरवाज़ा , मैं तो सब कुछ आर-पार देख पा रही हूँ। ऊंचा पूरा गुलतुर्रा लाल फूलों से लदा है, बेचारा अमरूद उसकी छाओं में पनप नहीं पाता पर फल बराबर देता है । ये और बात है कि ये फल कभी पक नहीं पाते । शैतान बच्चों की पूरी जमात उनपर निगाह लगाये रहती है ।
गुलतुरे की छाया में आराम से सोया हरे कालीन सा लॉन और उसके किनारे किनारे लगे फूलों के पौधे और उधर अशोक का ऊंचा दरख़्त साथ में दो बहनो सी बतयाती मौलश्री , अपनी जगह वहीँ हैं । दरवाज़े के पास अंदर सभी कमरों पर चिक पड़ी है । भाई लोग पढ़ें या क्रिकेट की चर्चा करें किसी को पता नहीं चलता । हाँ, जब वे बाहर आकर क्रिकेट खेलते या पतंग उड़ाने छत पर जाते तो एक शोर से सारा घर जाग उठता ।

बोगनविलिया और पीले फूलों वाले कनेर के साथ ही हम सब बड़े हुए। एक ओर फूलों से भरा आँचल बिछाये बैठी बेला की लतर रात भर महकती , सुबह सवेरे लुट जाती । सुबह शाम चिकों के पीछे कमरों से घंटी बजने और दबे दबे सुर में आरती का स्वर उभरता और शाम रात में ढल जाती ।

गर्मी में आँगन में बिछी ढेरों चारपाइयां और उनपर लेटी चाचियाँ, ताइयां , भाभियाँ , बहने और बच्चे - कहीं लोरिया , कहीं कहानियां तो कहीं आंसू और शिकायतें । सब हवा में आज तक घुली मिली हैं ।

पढाई वाले कमरे में लड़कियों की खुस-फुस , उनकी हसीं एक अनुशासन पसंद आवाज़ के डर से कहीं दुबक जाती । क्रिकेट कमेंटरी सुनने की चाहत लिए कान या बिनाका गीत माला के प्रेमी भी इसी आवाज़ से सहम बत्ती बंद कर कोने में छिप जाते ।

ताउजी की आवाज़ पर पर्दा करने वाली भाभियाँ , चाचाओं और भाइयों की आवाज़ पर काम के लिए दौड़ पड़ने वाली लड़कियां , लम्बी चौड़ी रसोई में चूल्हे के सामने पसीने में नहाईं भाभियाँ और चाचियाँ , उन सब की चूड़ियों की खनक , आपस की चुहलबाज़ियाँ इस दरवाज़े के पीछे आज तक गूंजती हैं ।

“बस आगई !” का शोर सुबह से कई बार घर मैं गूंजता । लाल रिबन के फूल बनाये छोटी छोटी लडकियां , हरे लाल स्कर्ट में कुछ बड़ी और फिर सलवार कमीज में सजी कुछ और बड़ी लड़कियों के लिए बसें बार बार सड़क पर रूकती , दरवाज़ा देखता रहता ।

लम्बी चौड़ी छत से लटकती रंग बिरंगी साड़ियों की कतार , धुप खाते अचार , बड़ियां और आलू पापड़ के आस पास टहलती लड़कियां , इतनी बातें उनकी कि खत्म ही ना हों कभी । और फिर इसी छत पर बारात का स्वागत भोज , दूसरी छत पर से गालियां गाती घर की महिलाएं और कान लगाकर मज़ा लेते बाराती और घराती । सिल्क के कुर्तों में सजे घर के सभी मर्द बारात की ख़ातिर में माहिर होते ।

कहते हैं आवाज़ें कभी मरती नहीं , हवाओं में सुरक्षित रहती हैं । मेरे आँगन में हर बरस गर्मी में लम्बें चौड़े आँगन में सजे मंडप से गूंजती मुरादाबाद वाले पंडित के मंत्रोच्चार कानों में अभी भी उत्तर आतें हैं ।

हाँ दरवाज़े के पीछे और भी बहुत कुछ है । एक नौकर जो नौकर कम , चौकीदार ज़्यादा है । एक बड़ा सा कमरा जिसे साहब का कमरा कहते थे और जो वाकई कुछ राजसी सा लगता था । इसके अलावा मेरी माँ की दमें से भारी साँसे , बड़ चाची के हाथ का मुसलसल हिलता पंखा , दादी का मंद स्वर में गीता पाठ और बड़े हंडे की चाय , जिसके बिना ज़िन्दगी बदमज़ा होजाती ।

दरवाज़ा खामोश है पर मैं उसमें बोलती आवाज़ों को सुन सकती हूँ जब चाहूँ तभी ।

वीरा चतुर्वेदी

By : Veera Chaturvedi
Veera Chaturvedi is a renowned author . She has many books to her credit. She is a freelancer you can find more of her articles on http://ipen-veera.blogspot.in/


ख़ामोश है दरवाज़ा

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